सटीक समाचार, नई दिल्ली। Pitru Paksha 2026 : पितृ पक्ष आज शुरू हो गया। आज भाद्रपद की पूर्णिमा है, ऐसे में आज यानि 26 सितंबर को पूर्णिमा का श्राद्ध हुआ। वैसे, श्राद्धों यानि पितृ पक्ष की औपचारिक शुरूआत 27 सितंबर रविवार को होगी। इस दिन अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि है। कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से अमावस्या तक श्राद्ध होते हैं।
पितृ पक्ष पर श्राद्ध कर्म, पिंडदान और तर्पण से पितर संतुष्ट और प्रसन्न होते हैं
पितृ पक्ष में पितरों के निमित्त श्राद्ध कर्म, पिंडदान, तर्पण और दान आदि करने से वे प्रसन्न और संतुष्ट होते हैं। मान्यता है कि इससे व्यक्ति को पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है और जीवन में आ रही बाधाएं दूर होती हैं। पितृ पक्ष में गया जी, कुरुक्षेत्र और हरिद्वार में श्राद्ध कर्म का काफी महत्व माना जाता है।
धार्मिक मान्यता- गया जी में श्राद्ध कर्म और पिंडदान से पितरों को मिलती है मुक्ति
गया जी में श्राद्ध मेले में देश-विदेश से हजारों की संख्या में लोग पहुंंचते हैं और पितरों की मुक्ति के लिए श्राद्ध कर्म आदि करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि गया जी में श्राद्ध, पिंडदान, तर्पण आदि करने से पितरों की आत्मा को परम शांति मिलती है और उनको मुक्ति मिलती है।
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कैथल के ढांड स्थित राधाकृष्ण मंदिर के पंडित कविराज भारद्वाज ने बताया कि पितृ पक्ष मेें पितरों का विधिवत श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण करना बेहर कल्याणकारी माना जाता है। अपने पितर के निधन की तिथि के अनुसार, श्रद्धा और पवित्र भाव से श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण करना चाहिए। इस दिन यथाशक्ति दान देना भी श्रेयस्कर माना जाता है।
कब कौन सा श्राद्ध और कैसे करें
27 सितंंबर – प्रतिपदा का श्राद्ध। पंडित भारद्वाज ने बताया कि इस दिन उस पूर्वज का श्राद्ध, पिंडदान और उनके निमित्त तर्पण किया जाता है, जिनका किसी भी मास की प्रतिपदा तिथि को निधन हुआ हो। इसके साथ ही मातृ पक्ष यानि नाना-नानी आदि पक्ष के उनव्यक्ति के निमित्त भी श्राद्ध और पिंडदान किया जा सकता है जिनकी मृत्यु की तिथि ज्ञात न हो।
28 सितंबर – द्वितिया तिथि का श्राद्ध: इस दिन उन पितरों या परिवार के उस सदस्य के निमित्त श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण आदि किया जाता है, जिनका निधन किसी भी मास की द्वितीया तिथि को हुआ हो।
29 सितंबर- तृतीया तिथि का श्राद्ध: किसी भी मास की तृतीया तिथि को जिन पितरों या परिवार के किसी सदस्य का निधन हुआ है उनके निमित्त इस दिन श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण करने का धार्मिक विधान है। इससे इन पितरों की आत्मा संतुष्ट होती है और वे प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं।
30 सितंबर : चतुर्थी का श्राद्ध: पंडित भारद्वाज ने बताया कि इस दिन उन पितरों या परिवार के लोगों का श्राद्ध कर्म, पिंडदान और जिनके निमित्त तर्पण किया जाता है जिनका इस तिथि को निधन हुआ है।
1 अक्टूबर : पंचमी का श्राद्ध: इस तिथि को उन लोगों या पितरों का श्राद्ध कर्म, पिंडदान और तर्पण किया जाता है, जिनका किसी भी मास की पंचमी तिथि को निधन हुआ हो। पंडित भारद्वाज के अनुसार, इस दिन मृत हुए उन अविवाहित लोगों के निमित्त भी श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण किया जा सकता है, जिनके मृत्यु की तिथि पता न हो।
2 अक्टूबर : षष्ठी और सप्तमी का श्राद्ध : इस दिन षष्ठी और सप्तमी दोनों तिथियों के श्राद्ध होंगे। अर्थात, परिवार के जिन लोगों या पितरों की मृत्यु किसी भी मास की षष्ठी व सप्तमी तिथि को हुई हो उनके निमित्त श्राद्ध कर्म, पिंडदान और तर्पण इस तिथि को होगा। इस बार षष्ठी और सप्तमी के श्राद्ध एक ही दिन पड़ रहे हैं।
3 अक्टूबर – अष्टमी का श्राद्ध : इस तिथि को उन पितरों और परिवार के लोगों के निमित्त श्राद्ध कर्म, पिंडदान और तर्पण होगा जिनकी मृत्यु किसी भी मास की अष्टमी तिथि को हुई हो।
4 अक्टूबर : नवमी तिथि का श्राद्ध: नवमी तिथि का श्राद्ध कर्म, पिंडदान और तर्पण उन पितरों और परिवार के लोगों के निमित्त करने का धार्मिक विधान है, जिनकी मृत्यु वर्ष के किसी भी मास की नवमी तिथि को हुई हो।
5 अक्टूबर : दशमी तिथि का श्राद्ध : इस तिथि को उन पितरों अथवा परिवार के लोगों के निमित्त श्राद्ध कर्म, पिंडदान और तर्पण किया जाता है, जिनकी मृत्यु किसी भी मास की दशमी तिथि को हुई हो।
6 अक्टूबर : एकादशी तिथि का श्राद्ध : इस तिथि को उन पितरों या परिवार के लोगों का श्राद्ध कर्म, पिंडदान और तर्पण किया जाता है जिनका निधन किसी भी मास की एकादशी तिथि को हुआ हो। एकादशी तिथि को इस दिन देह त्यागने वाले साधु-संन्यासियों के निमित्त भी श्राद्ध और पिंडदान किया जाता है।
7 अक्टूबर : द्वादशी तिथि का श्राद्ध : इस तिथि को उन पितरों या परिवार के लोगों का श्राद्ध कर्म, पिंडदान और तर्पण करने का धार्मिक विधान है, जिनका द्वादशी तिथि को निधन हुआ हो।
8 अक्टूबर : त्रियोदशी तिथि का श्राद्ध: इस दिन परिवार के उन लोगों और पितरों का श्राद्ध कर्म, पिंडदान और तर्पण किया जाता है, जिनका त्रयोदशी तिथि को निधन हुआ हो। इसके अतिरिक्त किसी छोटे बच्चे या शिशु की मृत्यु हो गई हो तो उनके निमित्त भी इस दिन श्राद्ध कर्म और पिंडदान करने का धार्मिक विधान है।
9 अक्टूबर : चतुर्दशी तिथि का श्राद्ध: इस दिन उन पितरों और परिवार के लोगों के निमित्त श्राद्ध कर्म, पिंडदान आदि किया जाता है जिनका चतुर्दशी तिथि को निधन हुआ है। इसके साथ ही जिन लोगों की मृत्यु दुर्घटना विष के कारण, आत्महत्या, हत्या, हिंसक घटना में हुई हो या अकाल मृत्यु हुई हो उनके लिए भी श्राद्ध कर्म और पिंडदान व तर्पण इस दिन करने की धार्मिक मान्यता है।
10 अक्टूबर : अमावस्या का श्राद्ध: इसे सर्व पितृ मोक्ष श्राद्ध भी कहा जाता है। इस दिन उन सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों के निमित्त श्राद्ध कर्म, तर्पण और पिंडदान किया जाता है जिनके निधन की तिथियां ज्ञात नहीं हैं। उन पितरों के लिए भी इस दिन श्राद्ध कर्म किया जा सकता है जिनका उनकी मृत्यु की तिथि पर नहीं कर पाए हों या भूल गए हों। इसके साथ ही पितृ पक्ष का समापन हो जाएगा।
(अस्वीकरण -इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक ग्रंथों और धार्मिक मान्यता श्रुतियों और परंपराओं से प्रचलित जानकारी के आधार पर केवल पाठकों की जानकरी के लिए दी गई है। इससे सटीक समाचार sateeksamachar.com और इसके लेखक की कोई सहमति या असहमति नहीं है। श्राद्ध कर्म आदि करने से पहले इस बारे में विद्वान पंडितों से अवश्य संपर्क कर लें। )


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