Sawan 2026 Special :शिव की साधना स्‍थल पर बने इस मंदिर की शिल्‍पकला है बेजाेड़, पत्‍थरों को थपकी देने पर आती है ‘डमरू’ की आवाज, 39 वर्ष में हुआ तैयार

हिमाचल प्रदेश के सोलन के पास स्थित जटोली शिव मंदिर। (फोटो सौजन्‍य सोशल मीडिया )
हिमाचल प्रदेश के सोलन के पास स्थित जटोली शिव मंदिर। (फोटो सौजन्‍य सोशल मीडिया )

नमिता झा (सटीक समाचार), नई दिल्‍ली। सावन को भगवान शिव का महीना माना जाता है। सावन में भगवान भोले शंकर की पूजा -अर्चना का विशेष महत्‍व है। इस दौरान शिवालयों और शिव मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है व खूब रौनक रहती है। देश में अनेक प्रसिद्ध शिव मंदिर हैं, लेकिन ह‍िमाचल प्रदेश के सोलन में स्थित जटोली मंदिर बेहद खास है। आइए, सावन के विशेष अवसर (Sawan 2026 Special) पर इस अद्भूत मंदिर के बारे में जानें।

बेजोड़ शिल्‍पकला का उदाहरण है जटोली शिवमंदिर

सुंदर प्राकृतिक छटा के बीच इस मंदिर की बेजोड़ शिल्‍पकला मन को मुग्‍ध कर देती है। जटोली मंदिर में स्फटिक का विशाल शिवलिंग स्‍थापित है, जिनके दर्शन से मन प्रफ्फुलित जाता है। ऊंची पहाड़ि‍यों पर देवदार के जंगलों के बीच शांत वातावरण में स्थित इस मंदिर में आकर भक्ति और शांति की अद्भूत अनुभूति होती है।

पत्‍थरों को थपथपाने से आती है डमरू जैसी ध्‍वनि

इस मंदिर की सबसे खास बात है कि यहां पत्‍थरों को हल्‍की थपकी देने या थपथपाने पर डमरू जैसी ध्‍वनि आती है। इसके निर्माण में करीब 39 वर्ष लगे थे। मंदिर की वास्‍तुकला दक्षिण- द्रविड़ शैली का उत्‍कृष्‍ट नमूना है। इसके निर्माण करीब 39 वर्ष लगे। इसका निर्माण सन् 1974 में शुरू हुआ और 2013 में पूरा हुआ। इसके बाद इसे श्रद्धालुओं के लिए खोला गया। इसका निर्माण देश-विदेश के श्रद्धालुओं के चंदे से हुआ।

सोलन से करीब सात किलोमीटर की दूरी पर है मंदिर

यह मंदिर सोलन शहर से करीब सात किलोमीटर की दूरी पर स्‍थ‍ित है। इसकी ऊंचाई 111 से 122 फीट मानी जाती है और इसे एशिया का सबसे ऊंचाई वाला शिवमंदिर माना जाता है। इसका निर्माण स्‍वामी कृष्‍णानंद परमहंंस महाराज ने शुरू कराया था। मंदिर के ऊपरी हिस्‍से पर लगा 11 फीट का सोने का कलश इसकी शोभा में चार चांद लगाता है।

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स्‍वामी कृष्‍णानंद परमहंस यहां सन् 1950 में आए। मंदिर के कोने में स्‍वामी कृष्‍णानंद की गुफा है। मंदिर परिसर में ही उनकी समाधि भी है। उन्‍होंने 1974 में मंदिर का न‍िर्माण कार्य शुरू करवाया। 1983 में उन्‍होंने समाधि ले ली। इसके बाद मंदिर निर्माण समिति ने कार्य जारी रखा और यह 2013 में तैयार हुआ।

ये हैं मान्‍यताएं

इस शिव मंदिर को लेकर कई मान्‍यताएं हैं। पौराणिक मान्‍यता है कि भगवान शिव भ्रमण के दौरान यहां रुके थे और तप किया था। इस मंदिर का नाम भगवान शिव की जटाओं के नाम पर जटोली रख गया।

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मंदिर के पास एक जलकुंड है। इसके जल को गंगा नदी के जल की तरह पवित्र माना जाता है। लोगों की मान्‍यता है कि यह जलकुंड भगवान शिव के त्रिशूल के प्रहार से बना था। मान्‍यता है कि इस क्षेत्र में पानी की गंभीर समस्‍या थी। स्‍वामी कृष्‍णानंद परमहंस ने इस संकट के निदान के लिए तपस्‍या की और इसके बाद भगवान शिव के त्रिशूल के प्रहार से यहां पानी निकलने लगा। मान्‍यता है कि इस जलकुंड के जल में स्‍नान करने ने गंभीर चर्म रोग ठीक हो जाता है।

आइए जानें मंदिर की कुछ खास बातें –

  • मंदिर के गर्भगृह में स्‍फटिक से निर्मित विशाल शिवलिंग स्‍थापित है।
  • शिवलिंग के सामने ही नंदी महाराज स्थापित हैं। गणेश जी ,दुर्गा जी , हनुमान जी की भी मूर्तियां स्थापित है ।
  • मंदिर को तैयार होने में करीब 39 साल लगे। इसका निर्माण 1974 में शुरू हुआ और 2013 में तैयार हुआ। स्‍वमी कृष्‍णानंद परमहंस महाराज ने इस मंदिर का निर्माण शुरू कराया था।
  • इसकी ऊंचाई 111 फीट है और इसके गुंंबद पर 11 फीट का स्‍वर्ण कलश लगा है। इससे मंदिर की ऊंचाई 122 फीट हो गई है। इसे एशिया का सबसे ऊंचा शिवमंदिर माना जाता है।
  • मंदिर सोलन शहर से करीब सात किलोमीटर की दूरी पर राजगढ़ राेड पर स्थ‍ित है।
  • इस मं‍दिर के पास पत्‍थरों को थपथपाने पर डमरु जैसी आवाज आती है।

1 Comment

  1. Shilpi Jha

    Bahut hi Badhiya jankari evam lekhan. Adbhut hai Bharat aur iske kisse.

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