सटीक समाचार, नई दिल्ली। बोफोर्स तोप सौदा मामला (Bofors Deal Case) आखिरकार 40 साल बाद समाप्त हो गया। बोफोर्स तोप सौदे में कमीशन दिए जाने के कथित आरोपों के कारण राजीव गांधी की सरकार को चुनावों में हार मिली थी। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई अंतिम याचिका को भी खारिज कर दिया। इसके साथ ही इस मामले का पूरी तरह पटाक्षेप हो गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, अबि इस मामले में सुनवाई के लिए कुछ नहीं
मीडिया रिर्पोटों के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय खंडपीठ ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि अब इस केस में सुनवाई की जरूरत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने 2005 के दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) के फैसले को चुनाैती देने वाली याचिका की सुनवाई करने से मना कर दिया।
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दिल्ली हाई कोर्ट ने 2005 में हिंंदुजा ब्रदर्स और बोफोर्स कंपनी को बोफोर्स तोप मामले से बरी कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह मामला जब 2005 में ही समाप्त हो चुका है तो अब इसमें क्या बचा हुआ है कि इस मामले में एक और याचिका की सुनवाई की जाए।
1986 में हुआ था बोफोर्स तोप सौदा
बता दें कि यह केस वर्ष 986 के बोफोर्स तोप सौदा मामला से जुड़ा था। 1986 में स्वीडन की बोफार्स कंपनी से 1437 करोड़ रुपये की खरीदने का सौदा हुआ था। बाद में वर्ष 1987 में आरोप लगाए गए थे कि इस सौदे में दलाली यानि कमीशन दी गई। विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इस मामले को खूब उठाया था और इसका नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस नेता और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की 1989 के लोकसभा चुनावों में हार हो गई थी।
इस मामले में काफी हंंगामा हुआ था और उस समय राजीव गांधी के मित्र रहे बाॅलीवुड अभिनेता अमिताभ बच्चन भी निशाने पर आ गए थे। इससे दुखी होकर उन्होंने लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था और राजनीति से किनारा कर लिया था। बाद में इस केस को पुख्ता और ठोस सुबूत नहीं होने के कारण खारिज कर दिया गया।
जानिये इसका घटनाक्रम –
- मार्च 1986 में भारत सरकार और स्वीडन की कंपनी एबी बोफार्स कंपनी के बीच 155 मिमी हॉवित्जर तोपों (बोफोर्स तोप) की खरीद के लिए 1437 करोड़ रुपये की डील हुई।
- अप्रैल 1987 में स्वीडिश रेडियो ने एक रिपोर्ट में आरोप लगाया कि इस सौदे में बोफोर्स कंपनी ने कथित तौर पर बिचौलियों और भारतीय अधिकारियों व नेताओं को कमीशन दिया है।
- 1987-88 के दौरान बोफाेल तोप डील देश में बहुत बड़ा मुद्दा बन गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार में मंत्री रहे विश्वप्रताप सिंह ने कैबिनेट से इस्तीफा देकर इस मामले में मोर्चा खोल दिया।
- 1989 के चुनाव में कांग्रेस की हार हो गई और विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बने।
- जनवरी 1990 में सीबीआइ ने इस मामले में केस दर्ज कर लिया।
- 1999-2000 में सीबीआइ ने इस मामले में कोर्ट में आरोपपत्र (चार्जशीट) दाखिल किया। इसमें हिंंदुजा बंधुओं और अन्य लोगों को आरोपी बनाया गया।
- फरवरी 2004 में दिल्ली हाई कोर्ट ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को इस मामले में किसी तरह के आपराधिक मामले से मुक्त माना।
- मई 2005 में दिल्ली हाई कोर्ट ने इस केस में हिंंदुजा बंधुओं औार बोफाेर्स कंपनी को सभी आपराधिक कार्यवाही रद कर दी और उनको इस मामले से मुक्त कर दिया। हाई कोर्ट ने कहा कि इस केस में सीबीआइ ठोस, पुख्ता और पर्याप्त सुबूत पेश नहीं कर सकी।
- 2011 में दिल्ली की ट्रायल कोर्ट ने इस मामले में मुख्य आरोपी बताए गए इटली के नागरिक ओटावियो क्वात्रोची को बरी कर दिया गया। क्वात्रोची की राजीव गांधी के परिवार का नजदीकी माना जाता था।
- 2013 में क्वात्राची का निधन हो गया और इसके साथ ही केस का अहम पहले समाप्त हो गया।
- नवंबर 2018 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में सीबीआइ की अपील को खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआइ द्वारा अपील करने में देरी पर सवाल उठाया। सीबीआइ ने 2522 दिनों के बाद अपील दायर की थी। कोर्ट ने देरी को लेकर सीबीआइ की दलीलों को नहीं माना।
- 6 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने बोफोर्स मामले को लेकर दायर की गई आखिरी याचिका को भी खारिज कर दिया।


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