New Plastic Currency: मनमाेहन सिंह सरकार के समय भी हुई थी प्‍लास्टिक नोट लाने की कोशिश, इन वजहों से RBI की योजना हो गई थी फेल

देश मेें 2009 में भी प्‍लास्टिक नोट चलाने की योजना बनी थी। (फाइल फोटो सोशल मीडिया)
देश मेें 2009 में भी प्‍लास्टिक नोट चलाने की योजना बनी थी। (फाइल फोटो सोशल मीडिया)

सटीक समाचार, नई दिल्‍ली। सरकार देश में पॉलीमर यानि प्‍लास्टिक के नए नोट (New Plastic Currency) लाने की तैयारी कर रही है। इसके लिए उसने रिजर्व बैंक आफ इंडिया (RBI) को 10 और 20 रुपये के 200 करोड़ नोट के ट्रायल की अनुमति दे दी। इस बीच, आरबीआइ (RBI) के गवर्नर संजय मल्‍होत्रा ने अगले वित्‍तवर्ष की शुरूआत में ये नोट बाजार में चलन के लिए आने की उम्‍मीद जताई है।

यह पहला अवसर नहीं है कि प्‍लास्टिक के नोट लाने की कवायद हो रही है। 17 साल पहले तत्‍कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार के समय भी प्‍लास्टिक नोट लाने की तैयारी की गई थी। यह याेजना कुछ कारणों से सिरे नहीं चढ़ पाई और इसे बीच में ही रोक दिया गया।

2009 में प्‍लास्टिक नोट चलन में लाने की बनी थी योजना

दरअसल, डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे तो 2009 में प्‍लास्टिक के नोट लाने की योजना बनाई गई और इस पर कार्य भी शुरू हो गया था। लेकिन, बाद में तकनीकी कारणों से इस योजना को बीच में ही छोड़ दिया गया। इसके बाद लंबे समय तक इस दिशा में कोई पहल नहीं हुई। 2009 में पॉलीमर करेंसी लाने की योजना के फेल होने में तकनीकी कमियों के साथ कई अन्‍य पहलू थे।

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2009 में प्लास्टिक नोट लाने की रिजर्व बैंक आफ इंडिया की योजना की फेल हाेने की वजह पहले से ठीक से होमवर्क करना भी माना जाता है। ऐसे में इस बार सबसे महत्‍वपूर्ण यह है कि इसको लेकर आरबीआइ (RBI) ने कितनी सटीक रणनीति बनाई है। उम्‍मीद की जाती है कि आरबीआइ ने हर पहलू को ध्‍यान में रखकर कदम बढ़ाया है।

2009 में इन वजहों से फेल हो गई थी योजना

  • योजना के फेल होने की मुख्‍य वजह कई तकनीकी कमियां थीं। इस बारे में पहले ध्‍यान नहीं दिया गया।
  • प्‍लास्टिक नोटों की छपाई की लागत उच्‍च थी।
  • एटीएम -सॉर्टिंग मशीनों में प्‍लास्टिक नोटों से अनुकूलता को लेकर दिक्‍कत थी।
  • तकनीकी कमियाें में सबसे प्रमुख थी कि भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप नोटों की छपाई नहीं हो सकी। इन नोटों की छपाई की स्‍याही जल्‍द निकलने लगी। इसके साथ ही मौसम के असर से ये नोट सिकुड़ने भी लगे। इसके अ‍तिरिक्‍त कुछ अन्‍य छोटी मोटी दिक्‍कतें भी सामने आईं।
  • इसके अलावा , एटीएम और नोट गिनने व उनकी छंटाई करने वाली मशीनें भी परंपरागत करेंसी के हिसाब से डिजायन की गई थींं। इनमें प्‍लास्टिक नोट आसानी से प्रोसेस नहीं हो पा रहे थे।
  • प्‍लास्टिक नाेटों पर लागत काफी अधिक आ रही थी। प्रारंभिक स्‍तर पर ही कच्‍चे माल यानि पॉलीमर सबस्‍ट्रेट का आयात और इनका निर्माण बहुत अधिक महंगा पड़ रहा था।
  • इन नोटों के सुरक्षा मानक और परिचालन से संबंधित समस्‍याएं सामने आईं।
  • इसके बाद 2016 की नोटबंदी और सुरक्षा मानकाें पर सुधार संबंधी कवायद के कारण आरबीआइ प्‍लास्टिक नोटों के बारे में ध्‍यान नहीं दे पाया।

पॉलीमर यानि प्‍लास्टिक नोट और कागज के नोट में अंतर-

  1. प्‍लास्टिक के नोट प्रॉलीप्रोपीलन नाम की प्‍लास्टिक फिल्‍म से बनी होती है। दूसरी ओर, कागज के नोट कॉटन और सूती लिंटन के मिक्‍स से तैयार होते हैं।
  2. ये बेहद मजबूत होते हैं। इनको फाड़ओर मोड़ना आसान नहीं होता। मोड़ने के बाद यह जल्‍द की अपने स्‍वरूप मेंं वापस आ जाते हैं। दूसरी ओर, कागज के नोट अपेक्षाकृत नाजुक होते हैं। इनको फाड़ा या मोड़ा जा सकता है और इससे इनके खराब होने की संभावना रहती है। आरबीआइ के गवर्नर संंजय मल्‍होत्रा का कहना है कि प्‍लास्टिक के नोट 30 साल तक सही रहेंगे।
  3. प्‍लास्टिक के नोटों के सुरक्षा फीचर बेहतर होते हैं। इनमें ट्रांंसपेरेंट विंडाे, होलाेग्राम ओर सिक्‍सोरिटी फीचर को आसानी से शामिल किया जा सकता है। कागज के नोटों में वाटरमार्क, सिक्‍योरिटी थ्रेड और माइक्रो लेटरिंग होती हैै,लेकिन प्‍लास्टिक नोओं की अपेक्षा इसकी नकल करना आसान होता है।
  4. प्‍लास्टिक नोटों में आसानी से छेद नहीं नहीं होता है और ये गंदे भी नहीं होते। गंदा होने पर इनको आसानी से साफ किया जा सकेगा। ये नोट नमी से या भीगने पर खराब नहीं होते। दूसरी ओर, कागज के नोटों में छेद हो सकता है और ये जल्‍द गंदे व खराब हो जाते हैंं। इनको साफ करना संभव नहीं होता है। ये नमी या भीगने से खराब हो जाते हैं।

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