सटीक समाचार, पानीपत। Panipat Jain Sthanak: यहां गांधी मंडी स्थिति जैन स्थानक में तपस्वी बद्री प्रसाद जी महाराज को उनके 40वें पुण्य स्मृति दिवस पर श्रद्धा सुमन अर्पित किए गए। इसके साथ ही 12 अक्टूबर को संथारा पूर्ण करनेवाली सुश्राविका तपस्वनी अंगूरी देवी को भी श्रद्धांंजलि दी गई। श्रद्धांजलि कार्यक्रम में लोग भक्ति और श्रद्धा से समाविष्ट रहे।
तपस्वी बद्री प्रसाद महाराज और तपवस्वनी अंगूरी देवी को श्रद्धा सुमन अर्पित
श्री एसएस जैन सभा (रजि.) के तत्वावधान में आयोजित श्रद्धांजलि कार्यक्रम में महा अभिग्रहधारी डॉ. राजेश मुनि जी महाराज, सेवाभावी राजेंद्र मुनि जी महाराज, महासाध्वी समता जी महाराज, तपस्विनी साध्वी भविका जी महाराज ठाणे-4 का सानिध्य रहा।
अभिग्रहधारी डॉ. राजेश ने कहा- तपस्वी बद्री प्रसाद जी महराज महामुनि थे
मुनिश्री जी डॉ.राजेश ने कहा कि तपस्वी जी महाराज एक कर्मठ, संयम शिरोमणि महामुनि थे। उनका 81 वर्ष की आयु में उम्र के लिहाज़ से 72 दिन का उत्कृष्ट संथारा एक उज्जवल कीर्तिमान है। उन्होंने तपस्वी जी और अपने गुरु तपस्वी श्री कान मुनि जी महाराज में कुछ समानताएं बताईं। उन्होंंने बताया कि दोनों की दीक्षा 1 जनवरी, 1945 को हुई और दोनों के पूरे परिवार ने दीक्षा ली
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तपस्वी बद्री प्रसाद महाराज ने 40 वर्ष की आयु में ली थी दीक्षा
उन्होंने कहा कि दोनों में मुख्य अंतर यह है कि तपस्वी जी की दीक्षा 40 वर्ष की आयु में हुई थी जबकि तपस्वी श्री कान मुनि जी की 12 वर्ष की छोटी आयु में दीक्षा हुई। तपस्वी जी के परिवार में 16 व 14 वर्ष के दो बेटे ही थे और वे दाेनों भी साथ ही दीक्षित हुए थे। वे सेठ प्रकाश चंद्र जी महाराज तथा भगवन् राम प्रसाद जी महाराज के नाम से सुप्रसिद्ध हुए। दोनों का संथारा सहित महापर्याणन हुआ। दूसरी ओर, तपस्वी श्री कान मुनि जी महाराज अपने पिता लाल चंद्र जी महाराज साहब के शिष्य बने। उनके दो भाई और उनकी दो बहनें भी दीक्षित हुई।
1987 में 72 दिनों में पूरा हुआ था संथारा
मुनि श्री ने बताया कि अति उत्तम साधु जीवन के पश्चात तपस्वी जी महाराज ने 5 अगस्त, 1987 को सोनीपत में संथारा ग्रहण किया। यह 72 दिन बाद 16 अक्टूबर 1987 को पूरा हुआ था। तपस्वी जी कहा करते थे कि मृत्यु मनुष्य के हाथ का खिलौना है।
अभिग्रहधारी डॉ. राजेश मुनि ने संथारा पर ही की थी पीएचडी
अभिग्रहधारी डॉ. राजेश मुनि जी महाराज ने दो अन्य संथारों का भी जिक्र किया। 1 जनवरी, 2024 को गांधी मंडी महिला स्थानक आत्म भवन में महासाध्वी श्री कुसुम प्रभा जी महाराज के 21 दिनों के संथारे के बाद के दिनों के वह स्वयं प्रत्यक्षदर्शी थे। 1,000 से भी अधिक संथारों का गहन अध्ययन करके इस विषय पर 3,000 पृष्ठों की थीसिस लिखकर पीएचडी की उपाधि प्राप्त करने वाले और स्वयं भी 137 संथारों का पचक्खान करवाने वाले मुनिश्री ने इसे उत्कृष्ट संधारों में से एक बताया था। गांधी मंडी में जैन स्थानक में चातुर्मास कर रहीं महासाध्वी श्री समता जी महाराज व तपस्विनी साध्वी श्री भविका जी महाराज उनकी शिष्या व पौत्र शिष्या हैं।
तपस्वनी अंगूरी देवी का संथारा 12 अक्टूबर को समालखा में हुआ था पूरा
उन्होंने सुश्राविका तपस्विनी अंगूरी देवी जी के संथारे की भी प्रशंसा की। उनका संथारा जो 5 अक्टूबर 2026 प्रातः 6:30 बजे से प्रारंभ होकर 12 अक्टूबर 2026 को 3.44 अपराह्न को पूरा हुआ। उन्होंने यह संथारा समालखा में विराजित स्पष्ट वक्ता, दृढ़ संयमी श्री धर्म मुनि से लिया था। वह श्री धर्म मुनि जी के 25 जुलाई 2022 को संथारे सहित देवलोक गमन करनेवाले प्रथम शिष्य तपस्वी श्री रघुनाथ मुनि की संसार पक्ष से धर्मपत्नी थीं।
वह श्री धर्म मुनि जी महाराज की ही आज्ञानुवर्ती महासाध्वी श्री सुबोध प्रभा जी महाराज, साध्वी श्री रजतश्री जी व साध्वी श्री रतनश्री जी महाराज की संसार पक्षीय माताजी थीं। महासाध्वी श्री सुबोध प्रभा जी की दोनों बहन साध्वियों तथा राजा खेड़ी में चातुर्मास कर रही संसार पक्ष से मां बेटियां साध्वी श्री रमनश्री जी महाराज, साध्वी श्री रचनाश्री जी महाराज व साध्वी श्री समताश्री जी महाराज सहित छह शिष्याएं और पांच पौत्र शिष्याएं हैं।
सुश्राविका अंगूरी देवी जी श्री धर्म मुनि जी की परम भक्त थी। अपने पतिदेव की दीक्षा के पश्चात स्वयं तप त्याग में लगी रहती थीं। अनगिनत आयंबिलों, अठाईयों के साथ 4 मास खमण की तपस्या भी कर चुकी थीं। उनकी संथारा लेने की इच्छा गत 12 वर्षों से थी। डॉ. राजेश मुनि महाराज ने निरंतर तपस्या में रहने वाले उनके सुपुत्र कृष्ण जैन को अनमोल रत्न कहा जो मुनीश्री जी के साथ अब तक बेले बेले पारणा करते रहे।
संथारा क्या होता है?
गांधी मंडी जैन सभा के संरक्षक डॉ. ए.पी. जैन ने संथारे की अवधारणा के बारे में बताया कि यह एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें एक व्यक्ति बड़ी आयु होने पर या असाध्य बीमारी से ग्रस्त होने पर मृत्यु को निकट जान कर स्वयं को मृत्यु को समर्पित कर देता है। इसमें वह हर सांसारिक रिश्ते या वस्तु से अपना नाता पूरी तरह तोड़ देता है, यहां तक कि उसे अपने शरीर से भी कोई मोह नहीं रहता।
संथारा लेने का निर्णय परिवारजनों की सहमति और बहुत सोच-विचार के बाद होता है
उन्होंने बताया कि संथारा करने वाले व्यक्ति ऐसा वह बहुत सोच विचार कर, पारिवारिक जनों की सहमति से करते हैं और यदि आसपास संत हो तो वह उनसे ही संथारा ग्रहण करते हैं। संथारा लेने के बाद वह घर में एक निश्चित स्थान पर ही स्थिर हो जाते हैं और खाना-पीना पूरी तरह छोड़ देते हैं। यदि किसी से जाने या अनजाने कोई अनबन रही हो तो उसके लिए उससे क्षमा याचना भी कर लेते हैं, 84 लाख जीवयोनियों के साथ। ऐसे व्यक्ति जीवन का पूरा शेष समय आत्मा में रमण करके, धर्म की बातें सुनकर बिताते हैं। इसकी अवधि कुछ मिनट से लेकर कईं महीना तक की हो सकती है।
डॉ. जैन ने बताया कि कोई साधु हो या साध्वी अथवा श्रावक या श्राविका, सबका अंतिम लक्ष्य संथारे सहित पंडित मरण को प्राप्त करना होता है। पर यह परम सौभाग्य बहुत ही कम लोगों को मिल पाता है। डॉ. जैन ने आगे बताया कि संथारे के पक्षकार वकील द्वारा ठीक से तर्क प्रस्तुत न करने के कारण राजस्थान के एक न्यायाधीश ने संथारे को आत्महत्या बताते हुए इस पर रोक लगा दी थी। बाद में इस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय ने पलट दिया था।
डॉ. जैन द्वारा प्रस्तुत उपरोक्त विवरण से भी संथारे और आत्महत्या के बीच जो आसमान और जमीन का फ़र्क पूर्णतया स्पष्ट हो जाता है। तप एक उत्कृष्ट क्रिया है, सद्ति का दाता है, जबकि आत्महत्या एक व्यक्ति का निकृष्टतम कृत्य है जो महापाप माना जाता है। डॉ. जैन ने यह भी बताया कि पानीपत के एक महान जैन संत श्री जिनेंद्र वर्णी के निकट संपर्क में रहने वाले भूदान आंदोलन के प्रणेता विनोबा भावे ने भी संथारे द्वारा देह त्याग किया था।

अभिग्रह में सहयोग के लिए सुरेश जैन और नवकार मंत्र जप पूरा होने पर प्रदीप जैन सम्मानित
इसके अलावा, अभिग्रह में सहयोग करने पर सुरेश जैन को जैन स्थानक में सम्मानित किया गया। इसके साथ ही नवकार मंत्र का जाप पूरा करने वाले प्रदीप जैन को सम्मानित भी किया गया। उन्होंने नवकार मंत्र का जाप अपने घर पर पूरा किया था। उनको जैन स्थानक में नरेंद्र जैन, राजेंद्र जैन, जगदीश जैन, डॉ. रामनिवास जैन डॉ. ईश्वर जैन व डॉ.एपी जैन ने सम्मानित किया।

