नमिता झा (सटीक समाचार), मुंबई। Sawan 2026 Special New : देश में 12 ज्याेतिर्लिंगों में नागेश्वर ज्योतिर्लिंग (Nageshwar Jyotirlinga) का विशेष स्थान है। इसे 10वां ज्योतिर्लिंग माना जाता है। गुजरात के द्वारका और वेत द्वारका के बीच दारुका वन क्षेत्र में स्थित यह ज्योतिर्लिंग श्रद्धालुओं को ध्यान और भक्ति से ओतप्रोत कर देता है। यहां श्रद्धालु मानो हर भय व पीड़ा से मुक्त हो महादेव के अनुराग में रम जाते हैं।
नागेश्वर ज्योतिर्लिंग में कालसर्प दोष के निवारण की भी है मान्यता
इसे नागों के देवता का स्थान भी कहा जाता है। नागेश्वर यानि नागों के ईश्वर। मान्यता के अनुसार, यहां कालसर्प दोष का निवारण भी होता है। मान्यता है कि यहां विशेष पूजन से कालसर्प दोष समाप्त या क्षीण हो जाता है। इसी कारण काफी संख्या में श्रद्धालु यहां कालसर्प दोष के निवारण के लिए आते हैं। मान्यता है कि नागेश्वर ज्येतिर्लिंग के दर्शन से हर तरह के भय और विष से रक्षा होती है।
पौराणिक कथा
शिव पुराण और पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस क्षेत्र में दारुक नाम का बेहद शक्तिशाली असुर रहता था। उसकी पत्नी का नाम दारुका था। दारुका को माता पार्वती से वरदान प्राप्त था। इस कारण दारुक और दारुका ने पूरे वनक्षेत्र पर आधिपत्य स्थापित कर लिया। वे आम लोगों और ऋषि-मुनियों पर अत्याचार करते थे। दारुक ने नाव पर जा रहे सुप्रिय नामक वैश्य (व्यापारी) को पकड़ लिया और कारागृह में बंद कर दिया।
सुप्रिय परम शिवभक्त था। कारागृह में काफी संख्या में लोग बंद थे। सुप्रिय वहां मिट्टी से शिवलिंग बनाकर पूजा करने लगा। उसने वहां बंद अन्य लोगों को भी ‘ॐ नमः शिवाय’ का जप करने को कहा। इस पर दारुक क्रुद्ध हो गया और सुप्रिय को मारने के लिए बढ़ा। सुप्रिय ने भगवान शिव को रक्षा के लिए पुकारा तो वह वहां धरती से चमकते ज्योतिर्लिंग की तरह प्रकट हुए। भगवान शिव ने दारुक और राक्षसों का नाश कर दिया।
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पौराणिक कथा के अनुसार, सुप्रिय की प्रार्थना पर भगवान शिव इसी ज्योतिर्लिंग के रूप में यहां स्थापित हो गए। मान्यता है कि उन पर नाग लिपटे रहने के कारण इस ज्योतिर्लिंग का नाम नागेश्वर पड़ गया।
क्या हैं नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की विशेष बातें ?
- यह दुर्लभ दक्षिणमुखी शिवलिंग है यानि शिवलिंग का मुख दक्षिण दिशा की ओर है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दक्षिणमुखी शिवलिंग को अत्यंत शक्तिशाली माना जाता है। इसका स्वरूप विशाल त्रिमुखी रुदाक्ष की तरह है।
- मंदिर परिसर में भगवान शिव की ध्यानमग्न अवस्था वाली विशाल प्रतिमा है। इसकी ऊंचाई लगभग 80 फीट है और यह लगभग 25 फीट चौड़ी है।
- यह ज्योतिर्लिंग जमीन की सतह से थाेड़ा नीचे है। श्रद्धालुओं को गर्भगृह में जाने के लिए सीढ़ियों से नीचे उतरना पड़ता है।
- मंदिर का शिखर करीब 110 फीट ऊंचा है। शिखर पर सुंदर नक्काशी की गई है।
- इस मंदिर का मुख पश्चिम दिशा की ओर है।
- मंदिर में श्रद्धालु गर्भगृह में जाकर ज्योतिर्लिंग का स्पर्श कर सकते हैं। इसके लिए पुरुषों को धोती-कुर्ता और महिलाओं को साड़ी या अन्य पारंपरिक वस्त्र पहनने होते हैं।
मंदिर के नक्शे की खास बात क्या हैं ?
- नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की बनावट सयनम मुद्रा यानि मानव शरीर के सोने की मुद्रा को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। इसके अलग-अलग भाग मानव शरीर के अलग-अलग अंगों को दर्शाते हैं।
- मंदिर के प्रवेश द्वार को महाद्वार कहा जाता है। इसे पैर का हिस्सा माना जाता है। सभा मंडप में भक्त बैठकर पूजा-ध्यान करते हैं। मान्यता के अनुसार, इसे पेट और छाती का हिस्सा माना जाता है।
- इसके साथ ही मान्यताओं में गर्भगृह को सिर का हिस्सा बताया गया है।
- मंदिर और इसका परिसर करीब 60 हजार फीट क्षेत्र में फैला हुआ है।
यहां कैसे पहुंचें?
- नागेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर की द्वारका पुरी से दूरी करीब 17-18 किलोमीटर है। यहां से समुद्र तट शिवराजपुर बीच (Shivrajpur Beach) करीब 20 किलोमीटर दूर है।
- यह मंदिर द्वारका रेलवे स्टेशन से करीब 16 किलोमीटर की दूरी पर है। रेलवे स्टेशन से बस, टैक्सी आदि से मंदिर तक पहुंच सकते हैं।
- सड़क मार्ग से यहां द्वारका शहर होकर पहुंच सकते हैं। हवाई यात्रा से यहां पहुंंचने के लिए पहले जामनगर एयरपोर्ट आना होगा। वहां से यहां की दूरी करीब 130 किलाेमीटर है। राजकोट एयरपोर्ट से भी यहां पहुंचा जा सकता है। राजकोट से नागेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर की दूरी करीब 230 किलाेमीटर है।
यहां से आसपास कौन से प्रमुख स्थल और तीर्थ हैं?
- द्वारिकाधाीश मंदिर।
- बेट द्वारका।
- सुदर्शन सेतु।
- गोमती घाट एवं संगम।
- गोपी तालाब तीर्थ।
- द्वारका बीच (समुद्र तट) और शिवराजपुर बीच (समुद्र तट)।
- रुक्मिणी देवी मंदिर।
- भड़केश्वर महादेव मंदिर।


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