सटीक समाचार, नई दिल्ली/कुरुक्षेत्र। Janmashtami 2026 Muhurta New: जन्माष्टमी पर इस बार विशेष संयोग बन रहा है। इस वर्ष जन्माष्टमी आज (4 सितंबर) मनाई जाएगी। इस बार जन्माष्टमी पर रोहिणी नक्षत्र पड़ने के साथ ही सर्वार्थ सिद्धि योग का महासंयोग बन रहा है। धार्मिक मान्यता है कि इस तरह के योग से जन्माष्टमी बेहद फलदायी हो गई है।
कुरुक्षेत्र के गायत्री ज्योतिष अनुसंधान केंद्र के संचालक पंडित रामराज कौशिक ने बताया कि वैदिक ज्योतिष में रोहिणी नक्षत्र का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र और मध्यरात्रि के निशीथ काल में हुआ था। इसलिए जन्माष्टमी पर रोहिणी नक्षत्र का संयोग श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है।
अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का संयोग
पंचांग के अनुसार, इस बार भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 4 सितंबर (आज रात) की रात्रि 2.25 बजे (2.25 AM) से शुरू हो गई और 5 सितंबर की रात 12.13 बजे (12.13 AM) तक रहेगी। उदया तिथि होने के कारण श्री कृष्ण जन्माष्टमी 4 सितंबर को मनाई जाएगी। पंडित पंडित रामराज कौशिक ने बताया कि रोहिणी नक्षत्र 4 सितंबर की रात 11.04 बजे (11.04 AM) तक रहेगा।

जन्माष्टमी पर निशीथ काल
पंडित कौशिक ने बताया कि जन्माष्टमी पर निशीथ काल के विशेष पूजा मुहुर्त का समय इस बार स्थान के अनुसार करीब 45 मिनट से 51 मिनट तक रहेगा। यह समय रात्रि 11.55 बजे (11.55 AM) से रात्रि 12.46 बजे (12.46 AM) तक रहेगा। धार्मिक मान्यताओं में जन्माष्टमी पर भगवान श्री कृष्ण की पूजन के लिए मध्यरात्रि को सबसे महत्वपूर्ण और उत्तम माना जाता है।
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उन्होंने बताया कि इस समय भगवान श्रीकृष्ण का विधि पूर्वक पूजन करना श्रेष्ठ और फलदायी होता है। मान्यताओं में श्रीकृष्ण का जन्म समय रात्रि लगभग 12.18 बजे माना जाता है।
कैथल के ढांड स्थित श्री राधाकृष्ण मंदिर के पंडित कविराज भारद्वाज ने बताया कि व्रत का पारण करते समय सर्वप्रथम श्रीकृष्ण का चरणामृत और पूजन के समय अर्पित किया गया तुलसी पत्र ग्रहण करना चाहिए। पारण के समय भगवान को अर्पित किया गया प्रसाद और सात्विक भोजन लें। भगवान को अन्य प्रसाद के साथ धनिया की पंजीरी अर्पित करने की भी परंपरा रही है।

जन्माष्टमी समय और पूजा का शुभ मुहुर्त –
- निशीथ काल – रात्रि 11.55 बजे (11.55 AM) से रात्रि 12.46 बजे (12.46 AM) तक। स्थान के अनुसार इस समय में कुछ अंतर हो सकता है। यह विशेष पूजा समय 45 मिनट से 51 मिनट तक हो सकता है।
- अष्टमी तिथि आरंभ – 4 सितंबर को रात्रि 02.25 बजे (02.25 AM) से शुरू हो गई।
- अष्टमी तिथि समाप्त- 5 सितंबर को रात्रि 12.13 बजे (12.13 AM)।
- रोहिणी नक्षत्र – 4 सितंबर को रात्रि 11.04 बजे (11.04 PM) तक।
ऐसे करें भगवान श्रीकृष्ण का पूजन और ये सामग्री रखें –
- जन्माष्टमी पर पूजन स्थान पर बाल श्रीकृष्ण की प्रतिमा या तस्वीर रखें।
- प्रतिमा का पंचामृत और गंगाजल से अभिषेक करेंं। उन्हें नए वस्त्र और मुकुट पहनाएं। मुकुट में मोर पंख हो। प्रतिमा या चित्र का माला, आभूषण और पुष्प आदि से श्रृंगार करें।
- इसके बाद तुलसी दल, माखन-मिश्री, फल, मिठाइयां, धनिया पंजीरी और मेवा आदि से भोग लगाएं।
जन्माष्टमी पर यह करें –
- श्रद्धालु प्रात:काल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान और स्वरूप चिंतन कर जन्माष्टमी व्रत का संकल्प लें।
- क्षमता और अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए निर्जला या फलाकार व्रत करें। व्रत में सबसे महत्वपूर्ण स्वच्छ चित रहना और भगवान का मनन व चिंतन करते रहना है।
- व्रत के दौरान भगवान श्री कृष्ण के नाम का भजन-कीर्तन और पूजा-अर्चना करते रहना चाहिए।
- रात्रि में निशीथ काल में भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा का पंचामृत व गंगाजल से अभिषेक करें और उन्हें नए वस्त्र व आभूषण पहनाएं। इसके पश्चात आरती करें और प्रसाद अर्पण कर भोग लगाएं। प्रसाद का लोगों में वितरण करें।
व्रत का पारण
- पंडित रामराम कौशिक और पंडित कविराज भरद्वाज के अनुसार, व्रत का पारण 5 सितंबर को सुबह 06.01 बजे (06.01 AM) या स्थानीय पंचांग के अनुसार किया जा सकता है।
जन्माष्टमी व्रत के दौरान यह नहीं करें
- किसी को कष्ट न दें। झूठ न बोलें।
- मन स्वच्छ विचार रखें और दूसरों की यथोचित सहायता और मान-सम्मान करें।
- व्रत अपनी क्षमता और स्वास्थ्य का ध्यान रखें। अपनी क्षमता और स्वास्थ्य की अनदेखी कर कठोर नियम का पालन न करेंं।
- व्रत के दौरान अशुद्ध और तामसिक वस्तुओं का प्रयोग न करें।
- भगवान श्रीकृष्ण को भोग लगाते समय प्रसाद में तुलसी दल अर्पित करना कदापि न भूलें।

