नमिता झा (सटीक समाचार), मुंबई। Sawan 2026 Special: महाराष्ट्र के संभाजीनगर (औरंगाबाद) जिले के वेरुल गांव में स्थित घुश्मेश्वर ज्याेतिर्लिंग में श्रद्धा और भक्ति का अनुपम अनुभव होता है। घुश्मेश्वर 12वें ज्योतिर्लिंग हैं। इसे घृष्णेश्वर के नाम से भी जाना जाता है। यहां के शांत वातावरण में भक्त का मन सहज ही शिवमय हो जाता है।
इस मंदिर के पास ही दुनिया में मशहूर एलोरा की गुफाएं हैं। ऐसे में घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग के पवित्र दर्शन के उपरांत एलोरा के प्रसिद्ध पर्यटक स्थल की यात्रा का अवसर भी मिलता है।
घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिए देश-विदेश से काफी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। यहा तीनों माध्यम सड़क, रेल और हवाई यात्रा से पहुंचा जा सकता है। घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन के साथ ही साथ शिवालय कुंड ( घुश्मा कुंड) के दर्शन की भी मान्यता है। इसके बिना इस तीर्थ की यात्रा को अधूरा माना जाता है।
यह है घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग की पौराणिक कथा
घुश्मेश्वर महादेव की स्थापना को लेकर पौराणिक कथा है। शिव पुराण में यह कथा मिलती है। इसके अनुसार, देवगिरि पर्वत के आसपास सुधर्मा नाम का ब्राह्मण रहता था। कोई संतान न होने पर उसने पत्नी सुदेहा की जिद पर उसकी छोटी बहन घुश्मा से विवाह कर लिया। घुश्मा परम शिव भक्त थी और प्रतिदिन 101 पार्थिव शिवलिंग बनाकर उनकी पूजा करने के उपरांत निकट के कुंड में प्रवाहित करती थी।
कुछ समय बाद घुश्मा ने एक बेटे को जन्म दिया। इससे सुदेहा अपनी बहन घुश्मा से ईर्ष्या रखने लगी। एक दिन घुश्मा अपनी बहू के साथ मिलकर पार्थिव शिवलिंग बनाकर रही थी और उसका बेटा सो रहा था। इसी दौरान घुश्मा की बहू घर के अंदर गई तो देखा कि सुदेहा ने उसके पति को मार कर उसी कुंड में डाल दिया है जहां घुश्मा पूजन के बाद पार्थिव शिवलिंग प्रवाहित करती थी।
बहू ने इस बारे में सास को बताया, लेकिन घुश्मा ने कहा कि चलो पहले महादेव की पूजा संपन्न करते हैं। इसके उपरांत दोनों सास बहू कुंड में पार्थिव शिवलिंग प्रवाहित करने पहुंचीं। उसकी भक्ति से प्रसन्न भगवान शिव प्रकट हुए और उसके पुत्र को जीवित कर दिया।
सुदेहा से क्रुद्ध होकर शिवजी ने उसे दंड देने लगे तो घुश्मा ने उसे क्षमा करने की प्रार्थना की। महादेव ने घुश्मा से वरदान मांगने को कहा तो उसने शिव से इसी स्थान पर ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान होने की प्रार्थना की। शिव ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। महादेव बोले कि यहां मैं तुम्हारे नाम से जाना जाऊंगा। यह ज्योतिर्लिंग घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग कहलाएगा।

मंदिर तोड़ने पहुंचा औरंगजेब यहां से लौट गया था
घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग से जुड़ी और एक कहानी भी है। कहा जाता है कि औरंगजेब मंदिरों को तोड़ता हुआ वेरुल पहुंचा तो यहां मंदिर का प्रवेश द्वार बेहद छोटा था। अब भी वह द्वार है लेकिन दूसरी तरफ से बड़ा रास्ता बना दिया गया है। औरंगजेब मंदिर के आगे झुकना नहीं चाहता था। इसलिए उसे कोई नुकसान पहुंचाए बिना लौट गया।
मंदिर में पूजा -दर्शन का समय और नियम क्या हैं?
- मंदिर प्रात: काल 5 बजकर 30 मिनट पर श्रद्धालुओं के लिए खुलता है। इसके बाद दोपहर 12 बजे से चार बजे तक मंदिर के कपाट बंद रहते हैं। मंदिर शाम के चार बजे से रात 9 बजकर30 मिनट तक खुला रहता है।
– श्रावण (सावन) मास में मंदिर के कपाट प्रात:काल 3 बजे से रात्रि 11 बजे तक खुले रहते हैं। इस समय में थोड़ा बदलाव हो सकता है।
आरती का समय –
– काकड़ आरती – प्रात: 5 बजकर 30 मिनट पर ।
– संध्या आरती – 7 बजकर 30 मिनट पर ।
श्रद्धालुओं के लिए गर्भगृह में पूजा व दर्शन के नियम
– पुरुष श्रद्धालु के गर्भगृह में प्रवेश और पूजा करने के लिए खास नियम हैं। इसके तहत कमर से ऊपर वस्त्र नहीं होने चाहिए।
यह ज्योतिर्लिंग मंदिर कितना पुराना है ?
- यह मंदिर करीब 3000 वर्ष पुराना माना जाता है।
छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद) शहर से कितनी दूर है घुश्मेश्वर ज्याेतिर्लिंग ?
- वेरुल स्थित घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग छत्रपति संभाजी नगर यानि औरंगाबाद से करीब 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। मुंबई से इसकी दूरी करीब 335 किलोमीटर है।
मंदिर की विशेषताएं और निर्माण शिल्प कैैसा है ?
- मंदिर के चारों ओर हरियाली और मन को माेहित करने वाली प्राकृतिक छटा है।
- यह बेहद सुंदर मंदिर ज्वालामुखीय लाल पत्थर (Red Volcanic Rock) से निर्मित है।
- मंदिर की वास्तुकला अनूठी मानी जाती है। इसकी वास्तुकला हेमाडपंंथी और दक्षिण भारतीय शैली का मिश्रण है।
- मंदिर के सभा मंडप में बेहद आकर्षक 24 नक्काशीदार स्तंभ हैं। इन स्तंभों पर देवी – देवताओं और पौराणिक प्रसंगों की सुंदर आकृतियां बनाई गई हैं।
- मंदिर के गर्भगृह में ज्योतिर्लिंग का मुख पूर्व दिशा की ओर है। यहां सभा मंंडप में नंदी महाराज के दर्शन होते हैं।
- मंदिर का शिखर पांच स्तरीय या मंजिला है। इसे सुंदर नक्काशी और देवी -देवताओं की मूर्तियों से सजाया गया है।
- इस मंदिर की एक खास विशेषता ‘लक्ष विनायक’ हैं। यह 21 गणेशपीठों में से एक हैं।
घुश्मेश्वर (घृष्णेवर) ज्योतिलिंग मंदिर का पुननिर्माण किसने और कब कराया?
- मध्यकाल में मंदिर काे विदेशी हमलावरों ने कई बार निशाना बनाया और इस कारण इसको काफी नुकसान पहुंचा। 16वीं सदी में महान मराठा सरदार मालोजी भोंसले ने इस मंदिर को ठीक कराया। मालोजी भोंसले मराठा साम्राज्य के संस्थापक महाराजा छत्रपति शिवाजी के पितामह (दादा) थे।
- इसके बाद 18वीं सदी में मंदिर का पुनर्निर्माण कराकर उसे वर्तमान स्वरूप महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने दिया।
इस ज्योतिर्लिंग के आसपास कौन से आकर्षक स्थल हैं ?
- यहां आसपास कई पर्यटक स्थल और आकर्षक स्थान हैं। मंंदिर से करीब एक किलाेमीटर की दूरी पर एलोरा की गुफाएं हैं। इसके अलावा पास में ही जैन गुफाएं, भद्र मारुति मंदिर ( लेटे हुए हनुमान जी की मूर्ति), ऐतिहासि क स्वथन देविगिरि किला, साक्षी विनायक मंदिर , पंचक्की आदि हैं
अस्वीकरण : इस लेख में दी गई जानकारी मान्यताओं और पौराणिक श्रुतियों पर आधारित हैं। इससे steeksamachar.com और लेखक व पोस्टकर्ता की किसी तरह ही सहमति नहीं है। यह लोगों लेख बस लोगों को इस मंदिर के बारे में जानकरी देने के लिए लिखा गया है।


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