नमिता झा (सटीक समाचार), मुंबई। Wild Life Phare Langur : भारत के त्रिपुरा और आसपास के क्षेत्र में पाया जाने वाला एक दुर्लभ वन्यजीव विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गया है। यदि समय रहते पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए तो प्रकृति और धरती की इस अनोखी धरोहर खाे जाएगी। यह दुर्लभ श्रेणी का वन्यजीव खास तरह का बंदर या लंगूर है। इसे फैरे लंगूर या ‘चश्मा बंदर’ कहा जाता है।
त्रिपुरा के जंगलों में पाए जाते हैं चश्मा बंदर
त्रिुपरा देश के पूर्वोत्तर में एक छोटा सा पहाड़ी राज्य है। यह राज्य तीन दिशाओं से बांग्लादेश जुड़ा हुआ है। इसकी सीमा असम और मिजोरम राज्यों से भी लगती हैं। त्रिपुरा प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर से परिपूर्ण है। यहां कई तरह के वन्य जीव हैंं , लेकिन इनमें सबसे खास हैं दुर्लभ फैरे लंगूर यानि चश्मा बंदर। इनको फायरे का पत्ती बंदर (Phayre’s Leaf Monkey) भी कहा जाता है।
इनकी आंंखों के चारों ओर ऐसी धारी होती है जिससे आभास होता है कि जैसे इन्होंने चश्मा पहन रखा है। इसी कारण स्थानीय लोग इनको ‘चश्मा बंदर’ भी कहते हैं। इन दुर्लभ लंंगूरों की संख्या लगातार गिर रही है और ये विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गए हैं।
भारत में कहां-कहां पाए जाते हैं
- ये दुर्लभ लंगूर मुख्य रूप से त्रिपुरा में पाए जाते हैं।
- इसके अलावा ये मिजोरम और असम की बराक घाटी में भी पाए जाते हैं।
- त्रिपुरा का ‘सिपहिजला वन्यजीव अभ्यारण्य’ इनका खास ठिकाना है। यहां इनकी संख्या लगातार कम हो रही है।
- पिछले दिनों किए गए एक अध्ययन में सात समूहों में 95 लंगूर पाए गए थे।
कैसा होता है इनका रूप-रंग, भाेजन और ठिकाना
- इनका शरीर अमूमन गहरे भूरे / काले रंग का और चेहरे के आसपास हल्के सफ़ेद बालों का साफ़ और स्पष्ट निशान होता है। ये चीज़ इन्हें और लंगूरों से अलग करती है।
- ये शाकाहारी ही होते हैं और पेड़ों की पत्तियां इनका ख़ास भोजन होती हैं।
- पत्तियों के अलावा ये फल ,फूल , बीज, कलियां भी खाते हैं।
- इनको पेड़ों पर रहना इन्हें बेहद पसंद है, पेड़ों की ऊंची टहनी पर बैठे रहते हैं।
- इनको ज़मीन पर उतरना पसंद नहीं है, इसलिए जमीन पर बेहद कम उतरते हैं।
- ये अकेले नहीं समूहों में रहते हैं। एक समूह में आठ से 19 लंगूर होते हैं। इन समूहों में वयस्क नर, मादा, बच्चे सभी रहते हैं। युवा लंगूर बड़े होने पर अपने जन्म वाले समूह से अलग हो जाते हैं और अलग समूह बनाते हैं।
- इनको सुबह- शाम ही ज़्यादा सक्रिय देखा गया है। ये दोपहर की गर्मी से परेशान हो जाते हैं और गतिविधि कम करते हैं। इस दौरान वे पेड़ों पर आराम करते हैं।
- इनके समूहों में अमूमन एक प्रमुख वयस्क नर और कई मादाएं होती हैं। यही कारण है कि इनके समूह का स्वरूप एक नर और कई मादाओं वाले समूह के रूप में नज़र आता है। मादा लंगूर बार में एक ही बच्चा पैदा करते हैं और इनके गर्भ की अवधि औसतन 205 दिन होती है।
- इनकी उम्र की सही जानकारी उपलब्ध नहीं है। ये शर्मीले होते हैं लेकिन चौकन्ने रहते हैं। खतरे का एहसास होते ही पेड़ों की ऊंचाई और घने पत्तों की ओट में छुप जाते हैं।
इस कारण लगातार घट रही है इनकी संख्या
इनकी संख्या लगातार घट रही है और इनके लुप्त होने का खतरा पैदा हो गया है। इसके ये प्रमुख कारण समझे जाते हैं-
- इनका शिकार होना। इनका काफी समय से शिकार हाे रहा है और इस पर लगाम लगाने के प्रयास सार्थक सिद्ध नहीं हुए हैं।
- जंगलों का कटना। जंगल की कटाई हो रही है और जंगलों का क्षेत्र घट रहा है। खेती के क्षेत्र और रबड़ व चाय बागानों का विस्तार हो रहा है। इसके साथ ही मनुष्य के आवासीय क्षेत्र के बढ़ने इन दुर्लभ वन्यजीवाें का आवासी क्षेत्र घटने से इतनी संख्या घट रही है।
इनकी संख्या में कमी
इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेजर (IUCN ) के आंकड़ों के अनुसार, पिछले तीन पीढ़ियों में इनकी वैश्विक जनसंख्या में कम से कम 50 प्रतिशत की की कमी आई ह । भारत में इनकी पूरी आबादी 1200 होने का अनुमान है।
इनके संरक्षण के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं
- इन दुर्लभ जीवों को बचाने के लिए कई कदम उठाना बेहद ज़रूरी है। ये त्रिपुरा के जंगलों की जैव विविधता का एक अहम हिस्सा है। यहां की सरकार इन्हें बचाने की जद्दोजहद में लगी हुई है। इनके प्राकृतिक आवास की रक्षा , शिकार और अवैध गतिविधियों पर नियंत्रण , जंगलों का संरक्षण, लोगों में जागरूकता बढ़ाना, कैप्टिव ब्रीडिंग और वैज्ञानिक निगरानी की जा रही है।
